राज्य
नीति
कर्नाटक सरकार की प्रक्रियाएं

विषय: नई औद्योगिक नीति - 2001

पढ़ें:

  1. 1. सरकारी आदेश संख्या सीआई 30 एसपीसी 96 दिनांक 15 मार्च 1996
  2. 2. सरकारी आदेश संख्या सीआई 30 एसपीसी 96 दिनांक 31 मई 1996
  3. 3. सरकारी आदेश संख्या सीआई 30 एसपीसी 96 दिनांक 14 मई 1999
  4. 4. सरकारी आदेश संख्या सीआई 30 एसपीसी 96 दिनांक 15 मई 1999

प्रस्तावना:


  1. सरकार ने उपरोक्त सरकारी आदेश 1 के द्वारा 1996 में एक समेकित औद्योगिक नीति तैयार की थी। उपरोक्त नीति में नए निवेशकों के लिए प्रोत्साहनों और रियायतों का एक पैकेज प्रस्तुत किया गया था। यह नीति उपरोक्त आदेश 2 से 4 के द्वारा समय-समय पर संशोधित की गई थी। यह नीति 31 मार्च, 1996 को समाप्त हो गई है।


  2. उद्योग के क्षेत्र में कर्नाटक अग्रणी रहा है। राज्य ने अनेक वर्षों से राज्य की अर्थव्यवस्था और उद्योग की बदलती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निरंतर प्रगतिशील औद्योगिक नीतियां बनाई हैं। विगत 100 वर्षों में, राज्य में एक सुदृढ़ और जबरदस्त औद्योगिक आधार के निर्माण की विशेष योग्यता है, सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उपक्रमों, निजी स्वामित्व वाले बड़े और मध्यम उद्योगों तथा एक अत्यंत विस्तृत लघु उद्योग क्षेत्र की सहज सुदृढ़ता को सम्मिश्रित करता है। राज्य ने उद्योग में क्षेत्रों के एक विस्तृत प्रतिबिंब पर अपनी सुदृढ़ता का प्रदर्शन किया है और यहां पुरानी अर्थव्यवस्था में सफलता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। हाल के समय में, कर्नाटक नई अर्थव्यवस्था में तीव्र कदम उठाने के साथ ही देश की ज्ञान और प्रौद्योगिकी राजधानी के रूप में उभरा है। सूचना प्रौद्योगिकी और संबंधित उद्योगों, जैव-प्रौद्योगिकी और सुदृढ़ अनुसंधान एवं विकास संस्थानों ने कर्नाटक को वैश्विक बाज़ार में स्थान बनाने का गर्व प्रदान किया है।


  3. कर्नाटक देश में शीर्ष पांच औद्योगीकृत राज्यों में से एक है। इलैक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रीसिज़न इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल्स, सिलेसिलाए परिधानों, जैव-प्रौद्योगिकी और खाद्य प्रसंस्करण जैसे प्रमुख क्षेत्रों के उच्च प्रौद्योगिकी वाले उद्योगों के संवर्धन में उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं। राज्य बंगलौर और कर्नाटक के अन्य भागों में विचारणीय प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का भी साक्षी रहा है।


  4. 1996-97 से 2000-2001 की अवधि के दौरान, औद्योगिक क्षेत्र में उपलब्धियां निम्न प्रकार थीं:

क्रमांक

क्षेत्र

स्थापित इकाइयों की संख्या

निवेश (करोड़ रुपए में)

रोज़गारों की संख्या

1.

लघु उद्योग

93,845

3008.78

4,44,259

2.

मध्यम उद्योग

194

2499.96

45,703

3.

बड़े और वृहत्तर उद्योग

21

8682.62

13,331


  1. बंगलौर में ज्ञान आधारित उद्योगों और प्रौद्योगिकी चालित क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुकाम बनने की विशेष योग्यता है और आज इसे विश्व में शीर्ष 10 टैक्नॉपोलिशों के रूप में मान्यता प्राप्त है। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की उन्नति आश्चर्यजनक है। 1995-96 में मात्र 45 अमेरिकन डॉलर के सॉफ्टवेयर निर्यातों से, आज बंगलौर 1.2 मिलियन अमेरिकन डॉलर का निर्यात करता है।


  2. शानदार प्रगति के बावजूद, देश में औद्योगिक गतिविधियों में एक सामान्य गिरावट रही है जिसने पिछले कुछ वर्षों के दौरान कर्नाटके औद्योगिक क्षेत्र पर भी अपना प्रभाव डाला है। एशिया की अर्थव्यवस्था में गिरावट ने इस्पात, सीमेंट, ऑटोमोबाइल आदि जैसे प्रमुख उद्योग क्षेत्रों की समस्याओं में बहुत अधिक वृद्धि की है। इसलिए नीति रूपरेखा को आगामी वर्षों में औद्योगिक उत्पादन की तीव्र पुनर्प्राप्ति के लिए संवेग देना होगा।


  3. भूमि की उपलब्धता की सीमाओं और सिंचाई संभावनाओं के विस्तार के कारण, औद्योगिक विकास, विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में, गैर-कृषि क्षेत्र में रोज़गार में वृद्धि के लिए परमावश्यक है। यह विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षित युवाओं की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए है जिन्हें न केवल रोज़गार सृजन योजना के रूप में अपितु ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में अति लघु उद्यम स्थापित करने हेतु प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।


  4. 31 मार्च, 2001 तक वैध 1996 की औद्योगिक नीति को भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, व्यापार के वैश्वीकरण की चुनौतियों और सार्वजनिक उद्यमों के निजीकरण के तर्क को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया था। नई सहस्राब्दी की शुरूआत के साथ, उद्योग और व्यापार ने प्रौद्योगिकी, नवाचार, नए उत्पादों और प्रक्रियाओं तथा व्यवसाय संव्यवहारों में दूरगामी और तीव्र परिवर्तनों को देखा है। अब पूरा विश्व एक बाज़ार है। देश ने हाल ही में नीति निर्देशों में आमूल परिवर्तन भी देखे हैं। प्रोत्साहन आधारित बिक्रीकर हटाने की राष्ट्रीय सहमति, करों के लिए एकसमान न्यूनतम दरों को अपनाने, विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत बहुआयामी व्यापारिक सत्ता द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों और अवसरों, प्रौद्योगिकी की प्रमुखता, बौद्धिक संपदा अधिकारों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने मिलकर औद्योगिक विकास के लिए एक नए और आमूल अभिगम की आवश्यकता को उत्पन्न कर दिया है।


  5. सरकार की सभी संबंधित एजेंसियों और विभागों तथा उद्योग संघों और चैंबरों के साथ बैठकों/विचार-विमर्शों की एक श्रृंखला आयोजित की गई है। इन बैठकों/विचार-विमर्शों के दौरान दिए गए सुझावों पर सरकार ने विचार किया है।


  6. मामले की विस्तृत जांच के बाद, एक नई औद्योगिक नीति बनाने की आवश्यकता को अनुभव किया गया है। इसके लिए निम्नलिखित आदेश हैं:

सीआई 167 एसपीआई 2001, बंगलौर, दिनांक 30 जून, 2001


    इस आदेश की प्रस्तावना में वर्णित परिस्थितियों में, सरकार इस आदेश के अनुबंध-क में वर्णित नई औद्योगिक नीति-2001 का आमेलन करती है। नई औद्योगिक नीति-2001 को इस आदेश के अनुबंध-ख में उल्लिखित प्रोत्साहनों और रियायतों के एक पैकेज द्वारा समर्थन दिया जाएगा। उपरोक्त औद्योगिक नीति और प्रोत्साहन पैकेज 1 अप्रैल, 2001 से प्रभावी समझे जाएंगे और तब से 31 मार्च, 2006 तक 5 वर्षों की अवधि के लिए वैध होंगे।

    इसे वित्तीय विभाग के यू.ओ. नोट्स संख्या एफडी 1120/ईएक्सपी-1/2000 दिनांक 5.5.2001 और 2.6.2001, शहरी विकास विभाग के यू.ओ. नोट संख्या यूडीडी 116 कोऑर्ड.2000 दिनांक 22.5.2000, ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग के यू.ओ. नोट संख्या आरडीपी 23 एसजेवाई 2000 दिनांक 22.7.2000, राजस्व विभाग के यू.ओ. नोट संख्या आरडी 92 एलजीपी 2000 दिनांक 6.1.2001 और संख्या आरडी 250 मुनोमु 2000 दिनांक 12.6.2000, वन, पारिस्थितिकी और पर्यावरण विभाग के यू.ओ. नोट संख्या एफईई 14 ईएनवी 2000 दिनांक 29.12.2000, श्रम विभाग के यू.ओ. नोट संख्या एलडी 75 कबानी 2000 दिनांक 12.1.2001 और 3.6.2000, ऊर्जा विभाग के यू.ओ. नोट संख्या ईडी 65 ईबीएस 2000 दिनांक 27.5.2000 तथा विधि विभाग के यू.ओ. नोट संख्या लॉ 1065 ओपीएन-2/2000 दिनांक 19.12.2000 की सहमति से जारी किया जा रहा है।

कर्नाटक के राज्यपाल
के नाम पर और उनके आदेशानुसार

(बी.एस. पाटिल)
प्रधान सचिव,
वाणिज्य और उद्योग विभाग

    सेवा में

    कर्नाटक राज्य राजपत्र के संकलनकर्ता - राजपत्र के आगामी अंक में प्रकाशित करने और विभाग को उसकी 1000 प्रतियों की आपूर्ति करने के अनुरोध के साथ।


    प्रतियां अग्रेषित:


  1. महालेखाकार, कर्नाटक, बंगलौर-1.
  2. मुख्य सचिव, कर्नाटक सरकार
  3. अतिरिक्त मुख्य सचिव, कर्नाटक सरकार
  4. एसीएस व विकास आयुक्त, कर्नाटक सरकार
  5. एसीएस व प्रधान सचिव, गृह और परिवहन विभाग
  6. एसीएस व प्रधान सचिव, वित्त विभाग
  7. सभी प्रधान सचिव और सचिव
  8. औद्योगिक विकास आयुक्त और निदेशक, उद्योग एवं वाणिज्य, कनीजा भवन, रेस कोर्स रोड, बंगलौर-1
  9. वाणिज्य कर आयुक्त, गांधी नगर, बंगलौर-9
  10. अध्यक्ष, केपीटीसीएल, कावेरी भवन, बंगलौर-9
  11. अध्यक्ष, केएसपीसीबी, पी.यू. बिल्डिंग, एम.जी. रोड, बंगलौर-1
  12. मुख्य निरीक्षक, कारखाना और बॉयलर, गांधीनगर, बंगलौर-9
  13. श्रम आयुक्त, वीआईएसएल बिल्डिंग, जे.सी. रोड, बंगलौर-2
  14. पंजीकरण महानिरीक्षक एवं स्टाम्प आयुक्त, के.आर. सर्किल, बंगलौर-1
  15. जिलों के सभी उपायुक्त
  16. संयुक्त निदेशक, सभी जिला उद्योग केंद्र
  17. सीएमडी, केएसआईआईडीसी, 36, कनिंघम रोड, बंगलौर-52
  18. सीएमडी, केएसएसआईडीसी, औद्योगिक क्षेत्र, राजाजीनगर, बंगलौर-10
  19. एमडी, केएसएफसी, तिम्मैया रोड, बंगलौर-560052
  20. एमडी, केएसआईएमसी, औद्योगिक क्षेत्र, राजाजीनगर, बंगलौर-10
  21. एमडी, कर्नाटक उद्योग मित्र, यूएनआई बिल्डिंग, तिम्मैया रोड, बंगलौर-52
  22. एमडी, वीआईटीसी, कस्तूरबा रोड, बंगलौर-560001
  23. एमडी, केसीटीयू, यूएनआई बिल्डिंग, तिम्मैया रोड, बंगलौर-52
  24. मुख्य सलाहकार, टीईसीएसओके, यूएनआई बिल्डिंग, तिम्मैया रोड, बंगलौर-52
  25. उप सचिव (कैबिनेट), डीपीएआर
  26. अवर सचिव (वाणिज्यिक कर), वित्त विभाग
  27. अध्यक्ष, एफकेसीसीआई, चैंबर ऑफ कॉमर्स बिल्डिंग, के.जी. रोड, बंगलौर-9
  28. चेयरमैन, कर्नाटक चैप्टर, सीआईआई, मनीपाल सेंटर, डिकेंसन रोड, बंगलौर-42
  29. अध्यक्ष, जीएमसीआई, शेरीफ चैंबर्स, कनिंघम रोड, बंगलौर-52
  30. अध्यक्ष, केएएसएसआईए, विजयनगर, बंगलौर-79
  31. महाप्रबंधक, सिडबी, सेंटीनरी बिल्डिंग, संख्या 26, एम.जी. रोड, बंगलौर-1
  32. महाप्रबंधक, आईडीबीआई, जनार्दन टावर्स, रेसीडेंसी रोड, बंगलौर-25
  33. महाप्रबंधक, आईसीआईसीआई, रहेजा टावर्स, एम.जी. रोड, बंगलौर-1
  34. महाप्रबंधक, आईएफसीआई, संख्या 3, कब्बोनपेट, मेन रोड, पोस्ट बॉक्स नंबर 6914, बंगलौर-2
  35. महाप्रबंधक, सभी वाणिज्यिक बैंक
  36. गार्ड फाइल/अतिरिक्त प्रतियां/कार्यालय प्रति

नई औद्योगिक नीति - 2001

अनुबंध-क



1.0   मिशन


    कर्नाटक का मिशन एक बाज़ार चालित, ज्ञान आधारित, दक्षतापूर्ण और प्रतिस्पर्धी औद्योगिक क्षेत्र के तीव्र विकास का संवर्धन करके अगले दशक तक 8 प्रतिशत से 9 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर प्राप्त करना है। यह कार्य उद्योगों को उच्च गुणवत्तापूर्ण आधारभूत संरचना, प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिए संस्थागत समर्थन, एक दक्षतापूर्ण, सक्रिय और पारदर्शी प्रशासनिक ढांचे के लिए व्यवसाय वातावरण के गैर-विनियमन और मानव संसाधनों की क्षमताओं के सृजन के साथ-साथ उद्यमिता को प्रेरणा प्रदान करके किया जाएगा। प्रस्तावित औद्योगिक नीति का लक्ष्य प्रतिवर्ष 10 से 12 प्रतिशत औसत औद्योगिक विकास दर प्राप्त करना और प्रतिवर्ष न्यूनतम 20,000 करोड़ रुपए के निवेशों को आकर्षित करना तथा प्रतिवर्ष औसतन न्यूनतम 1.5 लाख रोज़गार संभावनाओं का सृजन करना है।


2.0   उद्देश्य


    इस मिशन की प्राप्ति हेतु, नीचे निर्धारित उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा:

    क. जिन क्षेत्रों और बाज़ारों में कर्नाटक के पास रणनीतिक लाभ हैं, उनके तीव्र विकास को प्रोत्साहित करना।

    ख. तीव्र प्रौद्योगिकी उन्नयन के माध्यम से उत्पादों और प्रक्रियाओं में मूल्य संवर्धन को बढ़ाना।

    ग. विभिन्न क्षेत्रों यथा कृषि, बागवानी, पशुपालन, खनिज और मानव संपदा में क्षमता और संसाधनों का अधिकतम उपयोग।

    घ. गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मकता के वैश्विक मानकों को पूरा करने वाले नए उत्पादों के माध्यम से घरेलू और निर्यात के नए बाज़ारों में उद्योग की पहुंच बनाना।

    ङ. ज्ञान आधारित उद्योगों और सेवा क्षेत्र को प्रेरित करना।

    च. विकास के लिए मुख्य इंजिन होने के नाते निजी क्षेत्र के साथ एक बाज़ार संचालित पर्यावरण का सृजन करना।

    छ. उच्च गुणवत्तापूर्ण आधारभूत संरचना तक उद्योगों को पहुंच प्रदान करना।

    ज. लघु उद्योग क्षेत्र की संभावनाओं का पूर्ण दोहन और रोज़गार सृजन और स्थानीय संसाधनों के दोहरे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में अति लघु और लघु उद्योगों की स्थापना को प्रेरित करना। इस उद्देश्य के लिए, एक विशेषज्ञ समूह के माध्यम से सरकार लघु उद्योग क्षेत्र की वर्तमान स्थिति, समस्याओं और संभावनाओं के आकलन के लिए राज्य में उनका एक विस्तृत अध्ययन कराएगी और औद्योगिक क्षेत्र में रोज़गार सृजन पर एक पृथक नीति बनाएगी जिसमें अन्य चीज़ों के अलावा रोज़गार सृजन से संबद्ध एक उपयुक्त प्रोत्साहन भी सम्मिलित होगा। यह अध्ययन आगामी छ: माह में पूरा कर लिया जाएगा।


3.0   रणनीति


    इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित रणनीति अपनाई जाएगी:

    क. एक वृद्धिकारक बाज़ारोन्मुख अर्थव्यवस्था में मांग संचालित निर्णय प्रक्रिया प्रदान करने हेतु औद्योगिक नीति के सभी पहलुओं और इसके कार्यान्वयन में निजी क्षेत्र के साथ एक सुदृढ़ भागीदारी बनाना।

    ख. स्थानीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता को सुसाध्य और व्यापार कार्य को सरल बनाने के लिए एक नीति ढांचा सृजित करना।

    ग. दक्षतापूर्ण और प्रतिस्पर्धी औद्योगिक आधारभूत संरचना का निर्माण करने के लिए सार्वजनिक और निजी व्यय को बढ़ाना।

    घ. सरकारी अकादमिक - अनुसंधान एवं विकास संस्थानों और उद्योगों के मध्य सहजीवी और पारस्परिक लाभदायक संस्थागत व्यवस्थाओं के समावेश द्वारा प्रौद्योगिकी उन्नयन हेतु उत्‍प्रेरित करना।

    ङ. सूचना प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, खाद्य प्रसंस्करण, इलैक्ट्रॉनिक्स और दूरसंचार, परिधान, मशीन टूल और प्रीसिजन इंजीनियरिंग वस्तुओं के निर्यातों को बढ़ाकर उन तुलनात्मक लाभों को उत्प्रेरित करने पर ध्यान केंद्रित करना जो कर्नाटक को विश्व बाज़ार में प्राप्त हैं।

    च. बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए अति लघु, लघु और मध्यम उद्योगों के प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिए उनकी सहायता करना।

    छ. इन गतिविधियों में निजी क्षेत्र की पहल के संवर्धन द्वारा सरकारी आधारभूत संरचना एजेंसियों और वित्तीय संस्थानों सहित राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों की आमूल पुनर्संरचना।


4.0   नीति की रूपरेखा


    4.1   प्रौद्योगिकी उन्नयन

    औद्योगिक नीति का पहला सिद्धांत प्रौद्योगिकी होगी। विशेषकर, कर्नाटक में लघु और मध्यम उद्योगों के तीव्र प्रौद्योगिकीय उन्नयन के लिए एक संस्थागत तंत्र और जीवनक्षम मॉडल की स्थापना विशेष ध्यान आकर्षित करेगी। एक मांग चालित आधार पर क्षेत्रवार/उप-क्षेत्रवार प्रौद्योगिकी आवश्यकताओं की पूर्ति पर लक्षित क्लस्टर आधारित अभिगम को सुसाध्य बनाना उद्देश्य है। प्रौद्योगिकी उन्नयन के प्रयासों को उत्प्रेरित करने के लिए, कर्नाटक सरकार 5 वर्षों की अवधि में प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि नामक 50.00 करोड़ रुपए का एक निकाय स्थापित करेगी। इस निधि का संचालन एक सरकारी/उद्योग साझेदारी के माध्यम से और इसका कार्यान्वयन बाज़ार के तर्क और उद्योग द्वारा किया जाएगा। विशेष रूप से, यह निधि उन उद्योगों की मूल्य श्रृंखला में नव उत्पादों और प्रक्रियाओं पर ध्यान केंद्रित करेगा जिनमें कर्नाटक को तुलनात्मक लाभ और प्रौद्योगिकी तथा व्यवसाय में सर्वोत्तम प्रणालियों का प्रवर्तन प्राप्त है। इस योजना के अंतर्गत निम्नलिखित विशिष्ट योजनाओं और प्रस्तावों का कार्यान्वयन किया जाएगा:

    क. उन लघु और मध्यम उद्योगों को ब्याज सब्सिडी जिन्होंने प्रौद्योगिकी उन्नयन और आधुनिकीकरण के लिए राज्य वित्त निगम से ऋण प्राप्त किया है और जिसके लिए अलग से आदेश जारी किए गए हैं।

    ख. प्रौद्योगिकी व्यवसाय उत्प्रेरकों/संवेगों का राज्य में चिह्नित संभावित स्थानों में निजी क्षेत्र की सक्रिय सहभागिता के साथ संवर्धन करना। यह प्रौद्योगिकी व्यवसाय उत्प्रेरक का लक्ष्य लघु विकेंद्रित प्रौद्योगिकी विकास समूहों की सुदृढ़ताओं पर बनाया जाएगा और इससे उच्च मूल्य वाले लघु और मध्यम उद्यमों की उत्पत्ति की आशा है। सरकारी सहायता, 50 लाख रुपए प्रति उत्प्रेरक की सीमा के अध्यधीन, आधारभूत संरचना सुविधाओं के सृजन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के रूप में होगी।

    ग. राज्य के संभावित जिलों में अगले 5 वर्षों में दस और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी उद्यम पार्कों (एसटीईपी) की स्थापना। सरकारी सहायता, 25 लाख रुपए की सीमा के अध्यधीन, प्रत्येक एसटीईपी की लागत के 25 प्रतिशत तक आधारभूत संरचना सुविधाओं के सृजन के लिए पूंजीगत अनुदानों के रूप में होगी।

    घ. राज्य के विभिन्न जिलों में गुणवत्ता आश्वासन के साथ-साथ तात्विक और उत्पाद परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना के लिए निजी क्षेत्र को सहायता और प्रोत्साहन प्रदान करना। ये प्रयोगशालाएं विश्व व्यापार संगठन की उत्पाद व प्रक्रिया विधियों (पीपीएम) और स्वच्छता व पादम स्वच्छता (एसपीएस) उपायों से संगतता को सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करेंगी। ऐसी प्रयोगशालाओं और परीक्षण केंद्रों की स्थापना के लिए सरकारी सहायता, 10 लाख रुपए प्रति केंद्र की सीमा के अध्यधीन, पूंजीगत लागत के 10 प्रतिशत के पूंजीगत अनुदानों के रूप में होगी।

    ङ. सरकार लघु और मध्यम उद्यमों में संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंध और सर्वोत्तम प्रणालियों के संवर्धन की दृष्टि से लघु और मध्यम उद्यमों को आईएसओ 9000, आईएसओ 14000 और समकक्ष अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करेगी। 75,000 रुपए प्रति उद्योग की सीमा के अध्यधीन, सरकारी सहायता ऐसा प्रमाणन प्राप्त करने की लागत की 50 प्रतिशत पूर्ति के रूप में होगी।


    4.2   संरचना समर्थन

    क. कर्नाटक सरकार मानती है कि स्थानीय उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने हेतु प्रमुख मानदंड उन्हें प्रतिस्पर्धी मूल्यों पर उच्च गुणवत्तापूर्ण औद्योगिक संरचना तक पहुंच प्रदान करना है। इस उद्देश्य के लिए, सरकार 100 करोड़ रुपए के एक प्रारंभिक निकाय के साथ एक संरचना विकास निधि स्थापित करेगी। यह निधि सार्वजनिक-निजी साझेदारी के माध्यम से प्रमुख निजी संरचना प्रदाता की तकनीकी और वित्तीय सुदृढ़ताओं का लाभ प्राप्त करेगी। सरकार संरचना विकास और औद्योगिक संरचना प्रबंध में उत्प्रेरक दक्षता पर विशेष रूप से व्यय में वृद्धि करेगी। सामान्य संरचना निधि का लक्ष्य क्षेत्र विशिष्ट संरचनाओं और केंद्रित क्षेत्रों के लिए स्थान विशिष्ट प्रौद्योगिकी पार्कों/औद्योगिक संपदाओं/औद्योगिक क्षेत्रों/ औद्योगिक गलियारों की संरचना आवश्यकताओं की पूर्ति करना होगा। इस निकाय निधि का प्रयोग सामान्य औद्योगिक संरचनाओं में निवेशों की शुरूआत करने के लिए होगा जिसे उद्योग द्वारा प्राप्त किया जा सके।

    ख. औद्योगिक संरचना के बाज़ार चालित और दक्षतापूर्ण प्रबंध के विकास के सरकार के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, कर्नाटक सरकार प्रमुख स्थानों पर औद्योगिक टाउनशिप स्थापित करेगी जिनमें उद्योगों के क्लस्टर होंगे। औद्योगिक टाउनशिपों में निजी उद्योग संघों/प्रयोक्ता समूहों द्वारा औद्योगिक संरचनाओं का प्रबंध किया जाएगा। इन औद्योगिक टाउनशिपों से उद्योग को अपनी स्वयं की परिसंपत्तियों का प्रबंध करने और औद्योगिक संपदा/औद्योगिक पार्कों के भीतर आधारभूत संरचनाओं जैसे सड़कों, विद्युत, जलापूर्ति, दूरसंचार आदि के रखरखाव का ऊंचा स्तर सुनिश्चित करने की अनुमति देने की अपेक्षा की जाती है।

    ग. कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड अगले पांच वर्षों में क्षेत्र विशिष्ट/ स्थान विशिष्ट औद्योगिक पार्कों के विकास के लिए एक प्रमुख सरकारी एजेंसी के रूप में कार्य करेगा। अन्य चीज़ों के साथ-साथ, केआईएडीबी निम्नलिखित का संवर्धन करेगा:

    1. मलूर, बगलकोट, बेलगाम, चित्रदुर्गा और मड्डूर में पांच कृषि खाद्य प्रसंस्करण पार्क।
    2. दो परिधान निर्यात पार्क, बंगलौर और बेलारी प्रत्येक में एक-एक।
    3. हासन में एक विशेष आर्थिक जोन।
    4. मंगलौर में एक निर्यात संवर्धन औद्योगिक पार्क।
    5. तीन ऑटो पार्क, बिडाडी, शिमोगा और धारवाड़ प्रत्येक में एक-एक।
    6. बंगलौर के निकट जैव-प्रौद्योगिकी और संबंधित उद्योगों को समर्पित एक ज्ञान पार्क।
    7. बंगलौर के निकट एक संपूर्ण वित्तीय जिला। निजी क्षेत्र की सहभागिता के साथ केआईएडीबी द्वारा इन परियोजनाओं का कार्यान्वयन किया जाएगा। कर्नाटक सरकार केआईएडीबी को इन परियोजनाओं के लिए इक्विटी अंशदान के 15 प्रतिशत तक मार्जिन धन की सहायता प्रदान करेगी और वित्तीय सहायता भारत सरकार, बहुआयामी फंडिंग एजेंसियों के साथ-साथ उद्योग से प्राप्त की जाएगी।

    घ. यह सुनिश्चित करने के लिए कि उद्यमियों को मिलने वाली भूमि की लागत बेहिसाब न हो, जहां-कहीं सरकारी भूमि उपल‍ब्ध है, उसे नि:शुल्क केआईएडीबी को हस्तांतरित कर दिया जाएगा ताकि उद्यमियों को आवंटन के लिए केआईएडीबी द्वारा अधिगृहीत और विकसित भूमि के मूल्य को कम करने के लिए इसे एक ढाल के रूप में प्रयोग किया जा सके।

    ङ. केपीटीसीएल निम्नलिखित के द्वारा औद्योगिक क्षेत्र को अबाधित और गुणवत्तापूर्ण विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु कदम उठाएगा:

    1. अगले पांच वर्षों में सभी प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों/संपदाओं में पर्याप्त क्षमता के विशेष सब-स्टेशन स्थापित करना।
    2. 50 प्रतिशत औद्योगिक लोड के साथ 11 केवीए फीडरों को एकनिष्ठ औद्योगिक फीडरों/एक्सप्रेस फीडरों में परिवर्तित करना।


    4.3   मानव संसाधन विकास

    क. एक स्वयं-वहनीय औद्योगिक क्षेत्र के लिए एक बड़ी कुशल/ज्ञानाधारित श्रमशक्ति का विकास करना आधारभूत चीज़ है। उद्योग की सक्रिय भागीदारी के साथ, सरकार लघु और मध्यम उद्यमों द्वारा नियुक्त श्रमशक्ति की गुणवत्ता और कौशल के उन्नयन के लिए दस्तकार प्रशिक्षण संस्थानों, जिला उद्योग केंद्रों और पॉलिटेक्निकों के नेटवर्क को पुनर्जीवित करेगी। यह प्रयास निजी उद्योगों द्वारा निर्देशित बाज़ार आवश्यकताओं द्वारा चालित होगा। विद्यमान औद्योगिक श्रमशक्ति को पुनर्प्रशिक्षित और प्रशिक्षण प्रणालियों/विधियों को उन्नयन करने के प्रयास को उद्योग से प्रेरणा मिलेगी। यह परिकल्पना की गई है कि इस कार्यक्रम को पूरा ध्यान उद्योग को प्रशिक्षण संस्थानों का इस प्रकार प्रबंध करने की अनुमति देना होगा कि कौशल उन्नयन औपचारिक श्रम बाज़ार की आपूर्ति दिशा पर बाज़ार चालित हो।

    ख. एक सुदृढ़ उद्यमितापूर्ण आधार का संवर्धन करने की पहल के भाग के रूप में, सरकार कर्नाटक उद्यमिता विकास केंद्र (सीईडीओके) को सुदृढ़ बनाएगी। इसका उद्देश्य स्थानीय लोगों विशेषकर कम औद्योगीकरण वाले जिलों में, की सृजनात्मक क्षमताओं का उपयोग करना है। सीईडीओके को उद्यमिता विकास में कार्यरत मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सहयोग लेने के लिए प्रेरित किया जाएगा। निजी क्षेत्र के साथ सहभागिता में, कर्नाटक सरकार सीईडीओके को उद्यमिता विकास, व्यवसाय प्रबंध और प्रशिक्षण के बेहतरीन केंद्र के रूप में विकसित करना चाहेगी।

    ग. ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में अति लघु उद्यमों को प्रेरित करने के लिए, कर्नाटक सरकार राज्य के सभी जिलों में ग्रामीण विकास और स्वरोज़गार प्रशिक्षण संस्थानों (आरयूडीएसईटीआई) की स्थापना का अपना कार्यक्रम जारी रखेगी। सरकार ने वित्तीय संस्थानों और बैंकों के सहयोग से सफलतापूर्वक नौ आरयूडीएसईटीआई की स्थापना की है। अगले पांच वर्षों में कर्नाटक सरकार राज्य के प्रत्येक जिले में एक आरयूडीएसईटीआई की स्थापना करेगी। इन संस्थानों का प्रबंध स्थानीय उद्योगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मुख्यत: निजी पहल के माध्यम से होगा।

    घ. इसके अतिरिक्त, सरकार निम्नलिखित विशेषीकृत प्रशिक्षण संस्थानों का भी संवर्धन करेगी:

      क. बेलारी में इस्पात प्रौद्योगिकी संस्थान

      ख. बिडाडी, शिमोगा और धारवाड़ में तीन ऑटोमोबाइल प्रशिक्षण संस्थान।

    सरकार इन प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना और संचालन के लिए उद्योग संघों तथा स्टेकहोल्डरों की सहायता करेगी। सरकारी सहायता 50 एकड़ तक वांछित भूमि और अन्य संरचनाएं उपलब्ध कराने और 2.00 करोड़ रुपए प्रति संस्थान की सीमा के अध्यधीन, परियोजना की लागत के 10 प्रतिशत पूंजी अंशदान के रूप में होगी।


    4.4   व्यावसायिक वातावरण से नियंत्रण हटाना

    क. कर्नाटक में उद्योगों के लिए नीतिगत ढांचे का प्रमुख उद्देश्य उद्योगों की उन्नति के लिए एक सक्षम वातावरण प्रदान करना होगा। राज्य में व्यवसाय कार्य को सुगम बनाने के लिए विनियमन ढांचे का सरलीकरण करना एक प्रमुख सुधार उपाय होगा। विनियमन ढांचा अधिनियमों और नियमों की बहुलता, रखरखाव के लिए रजिस्टरों की बहुलता और ढेर सारे अनुमोदनों की प्राप्ति के भार से लदा हुआ है। आज उद्योग विभिन्न अधिनियमों और नियमों के अंतर्गत विभिन्न सरकारी विभागों/एजेंसियों के अनेक निरीक्षणों के भी अध्यधीन है। विद्यमान विनियमन ढांचा अनेक प्रकार से उद्योगों के विकास में बाधा पहुंचाता है। उद्यमियों को प्रवेश/ कार्यान्वयन स्तर के साथ-साथ संचालनों में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

    ख. इसीलिए व्यावसायिक वातावरण से नियंत्रण हटाना अनिवार्य है। उद्योगों के लिए एक दक्षतापूर्ण, उत्तरदायी और पारदर्शी प्रशासनिक ढांचा प्रदान करने के उद्देश्य से निम्नलिखित की परिकल्पना की गई है:

    1. विद्यमान नियमों में संशोधनों के माध्यम से समेकित औद्यागिक संवर्धन/नियंत्रण हटाने के उपाय करना।
    2. उद्यमियों को मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करने के साथ-साथ परियोजना के कार्यान्वयन स्तर पर विभिन्न विभागों से वांछित अनुमतियां/स्वीकृतियां/अनुमोदन/पंजीकरण/लाइसेंस प्राप्त करने हेतु कर्नाटक उद्योग मित्र (केयूएम) नोडल एजेंसी होगी।
    3. आवेदन प्रपत्रों की बहुलता को कम करने के लिए, एक एकीकृत आवेदन प्रपत्र प्रारंभ किया जाएगा।
    4. उद्योगों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा:

      क. खतरनाक और प्रदूषित उद्योगों की एक निषेधात्मक सूची जो सामान्य अनुमोदन प्रक्रिया के अधीन बनी रहेगी, और

      ख. खुली सूची में अन्य सभी उद्योग जो तीव्र गति स्वीकृतियों के पात्र होंगे।

    1. "तीव्र गति से स्वीकृति" के अंतर्गत उद्यमियों को विभिन्न संबंधित विभागों से आवश्य स्वीकृतियां प्राप्त करने के लिए एकल खिड़की के रूप में एकीकृत आवेदन प्रपत्र भरने और इसे कर्नाटक उद्योग मित्र को प्रस्तुत करने की आवश्यकता होगी।
    2. जहां संभव होगा, एकीकृत रजिस्टरों/रेकॉर्डों को प्रारंभ करके विभिन्न अधिनियमों/नियमों के अंतर्गत रजिस्टरों/रेकॉर्डों की बहुलता को सरलीकृत और तर्कसंगत बनाया जाएगा।
    3. जहां संभव होगा, एकीकृत रिटर्न प्रारंभ करके आवधिक रिटर्नों की बहुलता को सरलीकृत और तर्कसंगत बनाया जाएगा।
    4. एक यादृच्छिक वार्षिक निरीक्षण और केवल शिकायतों के आधार पर निरीक्षणों के माध्यम से विभिन्न विभागों के विभिन्न प्राधिकरणों द्वारा निरीक्षण को न्यूनतम और विनियमित किया जाएगा।
    5. उद्यमियों द्वारा स्व-प्रमाणन की एक योजना विद्यमान कानूनों और नियमों के अनुपालन के सुसंगत होगी। ऐसे स्व-प्रमाणन में व्यतिक्रम के लिए एक कड़ा दंडनीय प्रावधान होगा।

    ग. कर्नाटक सरकार उद्योगों का एक द्विवार्षिक सर्वेक्षण भी प्रारंभ करेगी। इसका उद्देश्य उद्योगों के प्रमुख निष्पादन संकेतकों पर प्राथमिक आंकड़े प्राप्त करना होगा जो सृजित अनुभवजन्य आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित नीति निर्धारणों के काम आएगा। यह सर्वेक्षण सरकार/उद्योग साझेदारी के लिए एक मंच के रूप में भी कार्य करेगा और प्रत्यक्ष नीति परिवर्तनों/ अशुद्धियों को ठीक करने के लिए मूल्यवान सूचना प्रदान करेगा।

    घ. विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत बहुआयामी व्यापारिक व्यवस्था के विभिन्न प्रभावों के लिए सरकार और उद्योग दोनों के द्वारा वास्तविक समय प्रत्युत्तर को सक्षम बनाने के लिए, कर्नाटक सरकार भारतीय प्रबंध संस्थान, बंगलौर और भारतीय राष्ट्रीय विधि विद्यालय के सहयोग से एक विश्व व्यापार संगठन रिले केंद्र स्थापित करेगी। इस रिले केंद्र का प्रबंध सरकार की ओर से केसीटीयू और वीआईटीसी तथा उद्योग की ओर से उद्योग संघों/निकायों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा। इस केंद्र के निम्नलिखित उद्देश्य होंगे:

    1. विश्व व्यापार संगठन द्वारा प्रभावित होने की संभावना वाले क्षेत्रों/ उप-क्षेत्रों के साथ-साथ उत्पादों व प्रकियाओं के लिए विश्व व्यापार संगठन और इसके प्रभावों पर एक विश्वसनीय और विस्तृत डाटाबेस की स्थापना करना। एक उपयुक्त प्रत्युत्तर तैयार करने में सक्षम बनाने के लिए यह डाटाबेस उद्योगों के साथ-साथ नीति निर्माताओं को उपलब्ध कराया जाएगा।
    2. निर्यात बाज़ारों के लिए अवसरों का प्रयोग करने में उन्हें सक्षम बनाने तथा विश्व व्यापार संगठन द्वारा प्रभावित प्रयोक्ता उद्योगों को विधिक, तकनीकी और प्रशासनिक समर्थन देना।
    3. गुणवत्ता, तकनीकी मानकों, स्वच्छता और पादप-स्वच्छता मानकों, उत्पाद तथा प्रक्रिया प्रणालियों जिनका विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत निर्धारित वैश्विक मानकों को पूरा करने के लिए स्थानीय उद्योगों को अनुपालन करना होगा, के रूप में वांछित रिले अनुवर्ती स्तर।
    4. गुणवत्ता परीक्षण और इन मानकों के अनुपालन के लिए क्षेत्र विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर्नाटक में संस्थानों में क्षमता निर्माण करना।.


    4.5   लघु उद्योग क्षेत्र के लिए विपणन सहायता

    राज्य और केंद्रीय दोनों स्तरों पर सरकारों ने खरीद और मूल्य वरीयता के माध्यम से सरकारी प्रापणों में लघु उद्योगों को विपणन सहायता प्रदान की है। लघु उद्योग क्षेत्र को विपणन सहायता प्रदान करने के लिए राज्य ने कर्नाटक लघु उद्योग विपणन निगम की भी स्थापना की है। इन उपायों ने एक बड़ी हद तक लघु उद्योगों की सहायता की है। यद्यपि, कर्नाटक (सार्वजनिक प्रापण में पारदर्शिता) अधिनियम, 2000 के लागू होने के साथ, लघु उद्योग क्षेत्र को उपलब्ध विशेष वरीयता समाप्त कर दी गई है। यह अधिनियम सरकारी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों, वैधानिक बोर्डों और सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट अन्य संस्थानों से प्रापणों के लिए अधिनियम की अनुप्रयोज्यता के अपवाद प्रदान करता है, किंतु लघु उद्योग क्षेत्र के संबंध में ऐसे कोई अपवाद नहीं बनाए गए हैं। यद्यपि, अधिनियम के अनुच्छेद-4 का उप-अनुच्छेद-छ कहता है कि "समय-समय पर सरकार द्वारा अधिसूचित विशिष्ट प्रापणों के संबंध में" अपवादों की अनुप्रयोज्यता उपलब्ध रहेगी। संपूर्ण रूप में लघु उद्योग क्षेत्र के समक्ष गंभीर रुग्णता और विश्व व्यापार संगठन के साथ हस्ताक्षरित विभिन्न करारों के प्रावधानों के पूर्ण कार्यान्वयन से अधिक गंभीरत होती जा रहीं समस्याओं के दृष्टिगत, यह आवश्यक है कि समय-समय पर लघु उद्योग क्षेत्र की सुरक्षा की जाए। इस पृष्ठभूमि में, यह आवश्यक है कि लघु उद्योग क्षेत्र को खरीद और मूल्य वरीयता को न्यूनतम अगले 5 वर्षों के लिए जारी रखा जाए। यह भी आवश्यक है कि सभी सरकारी विभाग, सार्वजनिक उपक्रम, वैधानिक बोर्ड और निगम कड़ाई से खरीद और मूल्य वरीयता का पालन करें। इसीलिए राज्य की लघु उद्योग इकाइयों जो भारत सरकार द्वारा समय-समय पर लघु उद्योग क्षेत्र के लिए आरक्षित मदों का निर्माण करती हैं, को खरीद-मूल्य वरीयता प्रदान करने के लिए कर्नाटक (सार्वजनिक प्रापण में पारदर्शिता) अधिनियम, 2000 में निम्नानुसार संशोधन करने का प्रस्ताव किया जाता है:

    क. लघु उद्योग क्षेत्र द्वारा आरक्षित मदों के 75 प्रतिशत को एक खुली निविदा प्रणाली के माध्यम से राज्य में अवस्थित इकाइयों से प्राप्त किया जाएगा।

    ख. राज्य की लघु उद्योग इकाइयों को न्यूनतम उल्लिखित मूल्य पर 15 प्रतिशत मूल्य वरीयता दी जाएगी।

    ग. यह लाभ 1 अप्रैल, 2001 से 5 वर्षों की अवधि के लिए उपलब्ध होगा।

    निम्नलिखित के लिए लघु उद्योग क्षेत्र की सहायता हेतु केएसआईएमसी की भूमिका का भी पुनर्निर्धारण किया जाएगा:
    1. उत्पादों की गुणवत्ता का उन्नयन।
    2. उत्पादन-विनिर्माण प्रक्रियाओं का उन्नयन।
    3. मूल्य कम करना, और
    4. निर्यातों में वृद्धि।


    5.0   एकल खिड़की तंत्र को सरल और कारगर बनाना


    यह सुनिश्चित करने के लिए कि परियोजनाओं के अनुमोदन/निगरानी के लिए एकल खिड़की तंत्र को अधिक प्रभावी बनाए जाए, विद्यमान योजना में निम्नलिखित संशोधनों का समावेश किया गया है:

    क. उद्योग, पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, कृषि खाद्य प्रसंस्करण और संरचना सहित सभी क्षेत्रों में 50 करोड़ रुपए से अधिक के सभी निवेश प्रस्तावों पर विचार करने और अनुमोदित करने के लिए बड़े और मध्यम उद्योगों के लिए माननीय मंत्री जी की अध्यक्षता में केवल एक उच्च स्तरीय समिति होगी। संबंधित मंत्रियों और अधिकारियों को सम्मिलित करके समिति की संरचना में उपयुक्त संशोधन किया जाएगा।

    ख. इसी प्रकार, सरकार के प्रधान सचिव, वाणिज्य एवं उद्योग विभाग की अध्यक्षता के अंतर्गत राज्य स्तरीय एकल खिड़की एजेंसी उद्योग, पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी, कृषि खाद्य प्रसंस्करण और संरचना सहित प्रत्येक मामले में 50 करोड़ रुपए से अधिक निवेश की सभी परियोजनाओं पर विचार और अनुमोदित करेगी। संबंधित विभागों और एजेंसियों के अधिकारियों को सम्मिलित करके समिति की संरचना में उपयुक्त संशोधन किया जाएगा।

    ग. इसी प्रकार, उपायुक्त की अध्यक्षता में जिला स्तरीय एकल खिड़की एजेंसी उद्योग, पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, कृ‍षि खाद्य प्रसंस्करण और संरचना सहित सभी क्षेत्रों में 3.0 करोड़ रुपए तक के निवेश के सभी प्रस्तावों की जांच करेगी।

    उपरोक्त समितियों के अधिकारों, प्राधिकरणों और कार्यों के विवरण से संबंधित आदेश अलग से जारी किए जाएंगे।

अनुबंध-ख


प्रोत्साहन और रियायतें

    उपरोक्त 1(क) पर सब्सिडी के अतिरिक्त, क्षेत्र-क के अलावा, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों तथा महिला उद्यमियों को 1.00 लाख रुपए की सीमा के अध्यधीन स्थाई परिसंपत्तियों के मूल्य के 5 प्रतिशत तक अतिरिक्त सब्सिडी उपलब्ध होगी। यद्यपि, यह अतिरिक्त सब्सिडी अनुच्छेद 1 के उप अनुच्छेद (क) में प्रदर्शित सकल वित्तीय सीमाओं के अंतर्गत होगी। उपरोक्त परिभाषा के अनुसार एक से अधिक विशेष श्रेणी के अंतर्गत आने वाली उद्यमी केवल एक विशेष श्रेणी के अंतर्गत विशेष सब्सिडी के पात्र होंगे।


    इस नीति में निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति और यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस नीति में वर्णित रणनीतियों/अभिगमों का सफलतापूर्वक कार्यान्वयन किया जा रहा है, सरकार 1 अप्रैल, 2001 को अथवा उसके बाद औद्योगिक क्षेत्र में किए गए नए निवेशों के लिए निम्नलिखित प्रोत्साहन और रियायतें प्रस्तुत करती है। यहां वर्णित विभिन्न प्रोत्साहनों और रियायतों के उद्देश्य के लिए, राज्य को निम्नलिखित चार क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है:-

विकसित क्षेत्र

क्षेत्र-क

विकासशील क्षेत्र

क्षेत्र-ख

पिछड़े क्षेत्र

क्षेत्र-ग

अभिवृद्धि केंद्र और लघु अभिवृद्धि केंद्र
विशेषीकृत औद्योगिक पार्क और तालुकाओं
की सूची

क्षेत्र-घ


    विभिन्न क्षेत्रों के अंतर्गत वर्गीकरण का विवरण अनुबंध-1 में दिया गया है।


1   निवेश सब्सिडी

    क. सरकार सभी नए अति लघु/लघु उद्योग क्षेत्र के उद्योगों को सब्सिडी प्रदान करेगी। विभिन्न क्षेत्रों में अति लघु/लघु उद्योग क्षेत्र के उद्योगों को उपलब्ध निवेश सब्सिडी का विवरण निम्नलिखित है:


क्षेत्र

विवरण

सब्सिडी के लिए पात्र उद्योग क्षेत्र

निवेश सब्सिडी

विकसित क्षेत्र

शून्य

शून्य

विकासशील क्षेत्र

अति लघु उद्योग

अधिकतम 5 लाख रुपए के अध्यधीन स्थाई परिसंपत्तियों के मूल्य का 10 प्रतिशत

पिछड़े क्षेत्र

अति लघु उद्योग

अधिकतम 10 लाख रुपए के अध्यधीन स्थाई परिसंपत्तियों के मूल्य का 20 प्रतिशत

अनुबंध-1 के
विवरणनुसार

अति लघु और
लघु उद्योग

अधिकतम 12.5 लाख रुपए के अध्यधीन
स्थाई परिसंपत्तियों के मूल्य का 25 प्रतिशत


    ख. विस्तार, विविधिकरण और आधुनिकीकरण के अंतर्गत नए औद्योगिक निवेश करने वाली औद्योगिक इकाइयों को निवेश सब्सिडी:

    अनुच्छेद 1(क) के अनुसार निवेश सब्सिडी नए अति लघु/लघु उद्योगों पर लागू निर्धारित वित्तीय सीमा में वृद्धि किए बिना विस्तार, विविधिकरण अथवा आधुनिकीकरण करने वाली सभी विद्यमान अति लघु और लघु उद्योग इकाइयों को भी उपलब्ध होगी, किंतु यह इस शर्त के अध्यधीन होगी कि इस आदेश के अनुसार इस सुविधा का आवंटन केवल किए गए अतिरिक्त निवेशों पर ही उपलब्ध होगा।

    ग. विशेष श्रेणी के उद्यमियों को अतिरिक्त सब्सिडी:

2   प्रवेश कर से छूट

    निम्नलिखित विवरणानुसार प्रवेश कर छूट का बड़े और मध्यम उद्योगों सहित सभी नए उद्योगों तक विस्तार किया जाएगा:

    क. इस शर्त के अध्यधीन कि परियोजना कार्यान्वयन के प्रारंभ होने की तिथि से अधिकतम 3 वर्षों की अवधि के लिए लाभ उपलब्ध होंगे, प्रत्यक्ष रूप से उत्पादन प्रक्रिया में सम्मिलित उत्पादन मशीनरी और उपकरणों पर परियोजना के कार्यान्वयन के दौरान।

    ख. वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ होने पर (संचालन चरण के दौरान), कच्चे माल, कलपुर्जों, अर्धनिर्मित वस्तुओं, सब-एसेंबलियों, उपभोक्ता वस्तुओं (उपभोक्ता वस्तुओं के रूप में प्रयुक्त पैट्रोल, डीज़ल, फर्नेन्स ऑयल, नाफ्था और एलएसएचएस अथवा कैप्टिव विद्युत सृजन इकाइयों के अलावा) पर। निम्नलिखित अनुसार प्रवेश कर छूट उपलब्ध होगी:

क्षेत्र

विवरण

प्रवेश कर छूट अवधि

विकसित क्षेत्र

शून्य

विकासशील क्षेत्र

3 वर्ष

पिछड़े क्षेत्र

5 वर्ष

अनुबंध-1 में विवरणनुसार

8 वर्ष


3   स्टाम्प शुल्क छूट और रियायती पंजीकरण प्रभार


    क.ऋण दस्तावेजों के लिए: सभी नई औद्योगिक इकाइयां और विस्तार, विविधिकरण तथा आधुनिकीकरण कर रहीं इकाइयां भी राज्य सरकार और/अथवा राज्य वित्त निगम, औद्योगिक निवेश विकास निगम, राष्ट्रीयकृत वित्तीय संस्थानों, वाणिज्यिक बैंकों, एलआरआरबी, औद्योगिक सहकारी बैंकों, खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड/खादी और ग्रामोद्योग आयोग, कर्नाटक राज्य अनुसूचित जाति/जनजाति विकास निगम, कर्नाटक राज्य अल्पसंख्यक विकास निगम और समय-समय पर सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य संस्थानों से ऋण करारों, ऋण विलेखों, बंधक और गिरवीकरण के संबंध में स्टाम्प शुल्क से 100 प्रतिशत छूट और पंजीकरण शुल्क में 1 रुपया प्रति 1000 की कमी के लिए पात्र होंगी। स्टाम्प शुल्क के भुगतान से यह छूट और रियायती पंजीकरण प्रभार सभी नए उद्योगों द्वारा प्राप्त की जाने वाली कार्यशील पूंजी सुविधाओं के संबंध में ऋण दस्तावेजों पर भी उपलब्ध होंगे।

    ख.भूमि/शेड के पंजीकरण के लिए: स्टाम्प शुल्क से छूट और पंजीकरण प्रभारों में कमी की रियायत राज्य संरचनात्मक विकास एजेंसियों जैसे केआईएडीबी, केएसएसआईडीसी, केईओएनआईसीएस, केएसआईआईडीसी आदि द्वारा आवंटित औद्योगिक भूखंडों, शेड, फ्लैट के संबंध में औद्योगिक इकाइयों द्वारा कार्यान्वित पट्टा विलेखों, पट्टा-सह-बिक्री तथा परिशुद्ध बिक्री विलेखों के लिए उपलब्ध होगी और औद्योगिक सहकारिताएं, औद्योगिक श्रमिक आवासीय टेनीमेंट और केआईएडीबी, केएसएसआईडीसी तथा केईओएनआईसीएस द्वारा विकसित आवासीय भूखंड भी स्टाम्प शुल्क में छूट और पंजीकरण प्रभारों में कमी की रियायत के लिए पात्र होंगे।

    रियायतें निम्न प्रकार होंगी:

क्षेत्र

स्टाम्प शुल्क पर छूट की सीमा

अनुप्रयोज्य पंजीकरण प्रभार

अति लघु और लघु उद्योग

मध्यम और बड़े उद्योग

अति लघु और लघु उद्योग

मध्यम और बड़े उद्योग

शून्य

शून्य

सामान्य

सामान्य

100 प्रतिशत

50 प्रतिशत

1.00 रुपया प्रति 1000 रुपए

सामान्य प्रभारों का 50 प्रतिशत

ग और घ

100 प्रतिशत

100 प्रतिशत

1.00 रुपया प्रति 1000 रुपए

1.00 रुपया प्रति 1000 रुपए


    ग.सरकारी एजेंसियों द्वारा आवंटित भूमि-शेडों का पंजीकरण मूल आवंटन मूल्य पर होगा: पट्टा, पट्टा-सह-बिक्री और परिशुद्ध बिक्री विलेखों को राज्य संरचनात्मक विकासात्मक एजेंसियों यथा केआईएडीबी, केएसएसआईडीसी, केईओएनआईसीएस, केएसआईआईडीसी और औद्योगिक सहकारिताओं द्वारा आवंटित भूखंडों, शेडों, फ्लैटों के आवंटन मूल्य के आधार पर पंजीकृत किया जाएगा। पट्टा अवधि की समाप्ति के पश्चात् भूमि, शेडों, फ्लैटों, आवासीय टेनीमेंट और आवासीय भूखंडों के संबंध में अंतिम बिक्री विलेख के पंजीकरण के समय भी उपरोक्त रियायत उपलब्ध होगी।

    घ. औद्योगिक संपदाओं, औद्योगिक शेडों/भूखंडों अथवा अन्य सामान्य सुविधाओं के उद्देश्य के लिए केआईएडीबी से केएसएसआईडीसी और अन्य समान सरकारी एजेंसियों को आवंटित भूमि के पंजीकरण के लिए स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण प्रभारों से सभी क्षेत्रों में 100 प्रतिशत छूट उपलब्ध होगी।

    ङ. संबंधित विभागों में सरकार के विचारार्थ विभिन्न सैक्टरों/क्षेत्रों (यथा औद्योगिक पार्कों/टाउनशिप, हवाई अड्डों/पत्तनों और सरकार द्वारा निर्धारित अन्य क्षेत्रों) में आवश्यकता का मूल्यांकन करने के बाद संरचना विकास परियोजनाओं के लिए आयोजना तथा प्रस्ताव तैयार करने हेतु केएसआईआईडीसी सरकार की नामित एजेंसी है। केएसआईआईडीसी और केआईएडीबी और अन्य समान सरकारी एजेंसियों द्वारा औद्यागिक क्षेत्रों, औद्योगिक शेडों, भूखंडों, कार्यालय स्थलों अथवा अन्य सामान्य सुविधाओं के उद्देश्य के लिए प्राप्त की गई भूमि के पंजीकरण के लिए सभी क्षेत्रों में स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण प्रभारों पर 100 प्रतिशत छूट उपलब्ध होगी।

    च. प्रमुख क्षेत्रों में प्रमुख परियोजनाएं: उद्योगों के निश्चित क्षेत्रों जिनमें राज्य के पास महत्वपूर्ण संसाधन/प्रौद्योगिकी आधार है, के विकास के लिए प्रोत्साहन देने के क्रम में, अनुबंध-2 में सूचीबद्ध उद्योगों को स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण प्रभारों के भुगतान से 100 प्रतिशत छूट उपलब्ध होगी। इन उद्योगों को प्रमुख क्षेत्रों में प्रमुख परियोजनाओं के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा और क्षेत्र ख, ग तथा घ में स्थापित ऐसे उद्योगों को भी यह लाभ उपलब्ध होगा।

    छ. अनुच्छेद-29 इकाइयां: केएसआईआईडीसी अथवा केएसएफसी से राज्य वित्त निगम अधिनियम के अनुच्छेद 29 के अंतर्गत उद्योगपतियों/ उद्यमियों द्वारा अधिगृहीत औद्योगिक इकाइयां स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण प्रभारों से छूट की पात्र होंगी जैसाकि उद्योग के आकार और स्थान पर आधारित अनुच्छेद 3-ख में सारणी में दर्शाया गया है।


4   निर्यात के लिए विशेष छूट

    निर्यातोन्मुख इकाइयों को निम्नलिखित लाभ प्रदान किए जाएंगे:

  1. 100 प्रतिशत निर्यातोन्मुख इकाइयां:

      क. उपरोक्त अनुच्छेद 1(क) में उल्लिखित निवेश सब्सिडी।

      ख. विद्युत कटौती से छूट।

      ग. एक पंजीकृत डीलर से कच्चे माल, कलपुर्जों, पैकिंग सामग्री, उपभोज्य वस्तुओं, पूंजीगत वस्तुओं, पुर्जे, सामग्री परिचालन उपकरण, इंटरमीडिएट्स, अर्ध-निर्मित वस्तुएं और सब- एसेंबलियों की खरीद पर प्रवेश कर और बिक्रीकर के भुगतान से छूट।

  1. 100 प्रतिशत निर्यातोन्मुख इकाइयों के अलावा कुल टर्नओवर के मूल्य का न्यूनतम 25 प्रतिशत के निर्यात प्रयास वाली इकाइयां:

      क. उपरोक्त अनुच्छेद 1(क) में वर्णित निवेश सब्सिडी।

      ख. एक पंजीकृत डीलर से कच्चे माल, कलपुर्जों, पैकिंग सामग्री, इंटरमीडिएट्स, अर्ध-निर्मित वस्तुएं और सब- एसेंबलियों की खरीद पर प्रवेश कर और बिक्रीकर की वापसी। जहां प्रवेश कर वापसी राज्य के भीतर अथवा बाहर की मदों से प्राप्त इन मदों के लिए उपलब्ध होगा, वहीं उपरोक्त वर्णित विभिन्न वस्तुओं की खरीद पर बिक्रीकर वापसी राज्य के भीतर स्थित डीलरों से खरीद पर ही उपलब्ध होगी।

  1. उपरोक्त उप अनुच्छेद 2 के मामले में, प्रवेश कर और खरीद पर बिक्रीकर देश के भीतर बिक्री के लिए उत्पादन हेतु प्रयुक्त कच्चे माल, कलपुर्जों, पैकिंग सामग्री, इंटरमीडिएट्स, अर्ध-निर्मित वस्तुओं और सब एसेंबलियों पर देय होगा।


5   बहुत बड़े उद्योग

    100 करोड़ रुपए से अधिक स्थाई परिसंपत्तियों में निवेश वाली परियोजनाओं को बहुत बड़े उद्योग/परियोजनाएं माना जाएगा। ऐसे बहुत बड़े उद्योग/परियोजनाएं निम्नलिखित विवरणानुसार विभिन्न क्षेत्रों में परियोजना स्थल पर निर्भर करते हुए प्रवेश कर तथा स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण प्रभारों में कमी के लिए पात्र होंगे:

क्षेत्र

प्रवेश कर छूट

Sस्टाम्प शुल्क

पंजीकरण प्रभार

शून्य

कोई रियायत नहीं

कोई रियायत नहीं

8 वर्ष

पूर्ण छूट (100 प्रतिशत)

1 रु./1000 रुपए

10 वर्ष

पूर्ण छूट (100 प्रतिशत)

1 रु./1000 रुपए

12 वर्ष

पूर्ण छूट (100 प्रतिशत)

1 रु./1000 रुपए


6   परिवर्तन शुल्क से छूट

    क्षेत्र-क के अलावा सभी क्षेत्रों में स्थापित अति लघु और लघु उद्योग इकाइयों को कृषि उपयोग से औद्योगिक उपयोग में भूमि के परिवर्तन के लिए परिवर्तन शुल्क के भुगतान पर छूट दी जाएगी। यह रियायत केवल अधिकतम 2 एकड़ की सीमा तक सीमित होगी। संबंधित नगरपालिका/ नगर आयोजन प्राधिकरणों और अन्य स्थानीय निकायों के चिह्नित औद्योगिक क्षेत्रों में कृषि भूमि का औद्योगिक भूमि में परिवर्तन स्वयंमेव होगा और संबंधित उपायुक्तों द्वारा 45 दिनों में आदेश जारी किए जाएंगे, ऐसा न होने पर यह मान लिया जाएगा कि परिवर्तन कर दिया गया है।


7   रुग्ण इकाइयों के पुनर्जीवीकरण/पुनर्वास के लिए राहत पैकेज

    रुग्ण इकाइयों को उनके पुनर्जीवीकरण/पुनर्वास के लिए निम्नलिखित लाभ प्रदान किए जाएंगे:
  1. लघु और मध्यम उद्योग जो बीआईएफआर द्वारा कवर नहीं हैं:
    1. सरकारी आदेश संख्या सीआई 12 पीयूएम 93 दिनांक 26.12.96 में उल्लेखानुसार विद्यमान मार्जिन मनी योजना जारी रखना।
    2. केपीटीसीएल बंद अवधि के दौरान स्थाई प्रभार/मांग प्रभार नहीं वसूलेगा।
    3. केपीटीसीएल के विद्युत बिलों के बकाए का 6 अर्धवार्षिक किश्तों में पुनर्भुगतान किया जाएगा और व्यतिक्रम के लिए ब्याज प्रभारों को घटाकर ½ प्रतिशत प्रति माह कर दिया जाएगा।
    4. वाणिज्यिक कर विभाग के कर बकाए का पुनर्भुगतान ½ प्रतिशत प्रतिमाह के मामूली ब्याज के साथ 6 अर्धवार्षिक किश्तों में किया जाएगा।
    5. केपीटीसीएल और वाणिज्यिक कर विभाग दोनों ही बंद अवधि के लिए ब्याज की गणना नहीं करेंगे।
    6. उद्योग द्वारा देय भावी करों को बिना ब्याज के 3 वर्षों की अवधि के लिए आस्थगित कर दिया जाएगा।
  1. बीआईएफआर मामलों के लिए:
    1. केपीटीसीएल बंद अवधि के दौरान स्थाई प्रभार/मांग प्रभार नहीं वसूलेगा।
    2. केपीटीसीएल के विद्युत बिलों के बकाए का 6 अर्धवार्षिक किश्तों में पुनर्भुगतान किया जाएगा और व्यतिक्रम के लिए ब्याज प्रभारों को घटाकर ½ प्रतिशत प्रति माह कर दिया जाएगा।
    3. वाणिज्यिक कर विभाग के कर बकाए का पुनर्भुगतान ½ प्रतिशत प्रतिमाह के मामूली ब्याज के साथ 6 अर्धवार्षिक किश्तों में किया जाएगा।
    4. केपीटीसीएल और वाणिज्यिक कर विभाग दोनों ही बंद अवधि के लिए ब्याज की गणना नहीं करेंगे।
    5. उद्योग द्वारा देय भावी करों को बिना ब्याज के 3 वर्षों की अवधि के लिए आस्थगित कर दिया जाएगा।
    6. सरकारी आदेश संख्या सीआई 26 बीआईएफआर 95 दिनांक 19.11.97 के अनुसार अन्य सभी लाभ/प्रोतसाहन उपलब्ध रहेंगे।


8   शर्तें और निबंधन

    8.1   इस नीति के अंतर्गत प्रोत्साहन और रियायतें 1 अप्रैल, 2001 से प्रभावी होंगी। इस आदेश के जारी होने के साथ ही औद्योगिक नीति, सरकारी आदेश संख्या 30 एसपीसी 96 दिनांक 15 मार्च 1996 और उसमें किए गए उत्तरवर्ती संशोधनों/परिवर्तनों द्वारा प्रदत्त प्रोत्साहन पैकेज और कृषि-खाद्य प्रसंस्करण उद्योग नीति 1999 तथा सरकारी आदेश संख्या सीआई 20 एसपीआई दिनांक 13 अप्रैल, 1999 तथा सरकारी आदेश संख्या सीआई 65 एसपीआई दिनांक 18 जनवरी, 2000 द्वारा ऑटो नीति के अनुसार उपलब्ध प्रोत्साहन और रियायतें वापस ले ली जाएंगी। यद्यपि, जिन औद्योगिक इकाइयों को उपरोक्त नीतियों के अनुसार पहले ही प्रोत्साहनों और रियायतों का पैकेज प्रदान किया जा चुका है, वे कथित संस्वीकृति आदेश की समाप्ति तक पहले दिए गए लाभों को प्राप्त करती रहेंगी। औद्योगिक इकाइयां जो 1 अप्रैल, 2001 को स्थापना की प्रक्रिया में हैं और जिनसे 1 अप्रैल, 2001 के बाद किंतु 30 जून, 2001 से पहले वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ कर देना अपेक्षित है, वे भी उपरोक्त संदर्भित पूर्व आदेशों के अनुसार प्रोतसाहनों और रियायतों के लिए पात्र होंगी। यद्यपि, 30 जून 2001 के बाद किए गए सभी नए निवेश केवल इसी नीति द्वारा कवर किए जाएंगे। वैश्विक निवेशक सम्मेलन के दौरान स्वीकृत की गई परियोजनाओं सहित 1.1.2000 से 31.3.2001 के दौरान स्वीकृत परियोजनाएं जिनके संबंध में विशेष सरकारी आदेश संख्या सीआई 125 एसपीआई 2000 से सीआई 195 एसपीआई 2000 दिनांक 8.7.2000 जारी किए गए हैं, भी इस नीति के अंतर्गत प्रोत्साहनों के लिए पात्र होंगी, बशर्ते कि किसी अन्य नीति के अंतर्गत उन्हें कोई अन्य प्रोत्साहन स्वीकृत न किया गया हो अथवा उन्होंने प्राप्त न किया हो।

    8.2   इस नीति के अंतर्गत प्रोत्साहन और रियायतें निर्माण और गैर-निर्माण दोनों श्रेणियों (जिस सीमा तक वे अनुप्रयोज्य हैं) में नई इकाइयों की स्थापना अथवा विद्यमान उद्योगों के विस्तार, विविधिकरण और आधुनिकीकरण दोनों के लिए सभी नए निवेशों पर उपलब्ध होंगी। विद्यमान उद्योगों जो विस्तार, विविधिकरण और आधुनिकीकरण कर रही हैं, पर विस्तार, विविधिकरण, आधुनिकीकरण परियोजना के प्रारंभ से पहले 3 वर्षों की अवधि के लिए औसत कर देयता पर आधारित विद्यमान कर देयता जारी रहेगी।

    8.3   यद्यपि, सूचना प्रौद्योगिक/जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में निवेशों के लिए प्रोत्साहन और रियायतें सरकारी आदेश "एमएएचआईटीआई" के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी नीति और जैव-प्रौद्योगिकी नीति के अनुसार शासित होते रहेंगी।

    8.4   इस नीति के लिए प्रोत्साहन और रियायतें अनुबंध-3 में विनिर्दिष्ट उद्योगों को उपलब्ध नहीं होंगी।

    8.5   परिभाषाएं:

      क.  अति लघु उद्योग: अति लघु उद्योग वे हैं जिनमें इकाई के स्थान पर ध्यान न देते हुए संयंत्र और मशीनरी में 25 लाख रुपए से कम का निवेश है।

      ख.   लघु उद्योग: एक औद्योगिक उपक्रम जिसमें संयंत्र और मशीनरी में स्थाई परिसंपत्तियों, चाहे स्वामित्व की शर्तों पर हों अथवा पट्टे पर अथवा किराया खरीद द्वारा, में निवेश 100 लाख रुपए से अधिक न हो।

      ग.    मध्यम और बड़े उद्योग: एक औद्योगिक इकाई जिसे अति लघु/लघु/अनुषंगी उद्योग के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है, को मध्यम/बड़े उद्योग के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।

      घ.   100 प्रतिशत निर्यातोन्मुख इकाइयां (निर्यातोन्मुख इकाइयां): एक 100 प्रतिशत निर्यातोन्मुख इकाई वह है जो समय-समय पर भारत सरकार द्वारा अनुमेय और परिभाषित छूट के अध्यधीन अपनी वस्तुओं के सकल उत्पादन का निर्यात करती है। ऐसी इकाइयां निर्यातोन्मुख इकाइयों अथवा निर्यात संवर्धन औद्योगिक पार्क योजना अथवा इलैक्ट्रॉनिक हार्डवेयर प्रौद्योगिकी पार्क योजना अथवा सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी पार्क योजना अथवा विशेष आर्थिक क्षेत्र के अंतर्गत स्थापित हो सकती है।

      ङ.   बहुत बड़ी परियोजनाओं: से तात्पर्य 100 करोड़ रुपए अथवा अधिक के निवेश वाली परियोजनाओं से है।

      च.   स्थाई परिसंपत्ति: स्थाई परिसंपत्तियों से तात्पर्य भूमि, भवन और संयंत्र तथा मशीनरी और अन्य उत्पादक परिसंपत्तियों जैसे टूल्स, जिग्स और फिक्सचर, डाइयां, उपयोगिताएं जैसे बॉयलर, कंप्रेसर, डीज़ल जनरेटिंग सैट, क्रेन, सामग्री परिचालन उपकरणों और उत्पादन उद्देश्यों से प्रत्यक्ष रूप में संबंधित अन्य उपकरणों पर किए गए सकल निवेश से होगा।

    8.6   इस सरकारी आदेश के अनुसार प्रोत्साहनों और रियायतों की स्वीकृति निम्नलिखित शर्तों और निबंधनों के अध्यधीन होगी:

      क.   सभी नए औद्योगिक निवेश अधिकतम संभव अतिरिक्त रोज़गार अवसरों का सृजन करेंगे और सकल आधार पर स्थानीय लोगों को न्यूनतम 80 प्रतिशत रोज़गार प्रदान करेंगे (समूह ग और घ श्रेणियों के मामले में स्थानीय लोगों को 100 प्रतिशत रोज़गार पर बल दिया जाएगा) तथा प्रोत्साहनों और रियायतों के संवितरण के दौरान इसकी निगरानी की जाएगी।

      स्थानीय लोगों को रोज़गार संबंधी उपरोक्त आवश्यकता की निगरानी 5 वर्षों की अवधि के लिए जिला उद्योग केंद्र द्वारा की जाएगी। उपरोक्तानुसार स्थानीय लोगों को रोज़गार प्रदान करने में उद्योगों की असमर्थता की रिपोर्ट प्रधान सचिव, वाणिज्य और उद्योग विभाग की अध्यक्षता वाली राज्य स्तरीय समिति को की जाएगी जो इकाई को स्वीकृत निवेश सब्सिडी की वसूली के लिए अनुशंसा करेगी जिस उद्देश्य के लिए सब्सिडी के संवितरण से पहले कंपनी द्वारा एक उपयुक्त अनुवचन प्रस्तुत किया जाएगा।

      ख.   निवेश सब्सिडी की मात्रा की गणना अनुच्छेद 8.5 के उप अनुच्छेद (च) में विनिर्दिष्ट स्थाई परिसंपत्तियों के मूल्य पर और वित्तीय संस्थानों तथा वाणिज्यिक बैंकों के अनुमोदनानुसार की जाएगी। जिन मामलों में उद्यमियों ने वित्तीय संस्थानों अथवा बैंकों से ऋण प्राप्त नहीं किया है, प्रोत्साहनों की गणना चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा प्रमाणित अनुसार वास्तविक निवेशों पर की जाएगी।

      ग.   उपरोक्तानुसार अति लघु, लघु अथवा मध्यम ओर बड़े उद्योगों की परिभाषा, भारत सरकार द्वारा इस परिभाषा में जब भी परिवर्तन किए जाएंगे, उसके अनुसार परिवर्तित हो जाएगी और इस पैकेज के अंतर्गत अति लघु, लघु, मध्यम और बड़ी इकाइयों को संबंधित तिथियों से नई परिभाषा के अनुसार लाभ प्राप्त होंगे।

      घ.   इस आदेश के अनुसार प्रोत्साहनों और रियायतों की वैधता 1 अप्रैल, 2001 से पांच वर्षों की अवधि (अर्थात् 31 मार्च 2006 तक) के लिए होगी।

      ङ.   संबंधित एजेंसियों और अधिकारियों के मार्गदर्शन के लिए इन प्रोत्साहनों और रियायतों के प्रशासन हेतु पृथक दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे। इस सरकारी आदेश की व्याख्या और उस पर प्रधान सचिव, वाणिज्य और उद्योग विभाग की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय समन्वय समिति का निर्णय अंतिम होगा।


Annexure - 1

Classification of Zones

Sl.No

District

Zone

1

Bangalore [U] & Bangalore [R] [Excluding Kanakapura & Magadi Taluks]

A

2

Dakshina Kannada

   

3

Shimoga

   

4

Tumkur [Excluding Pavagada, Sira, & Gubbi Taluks]

   

5

Belgaum [Excluding Ramdurga Taluk]

   

6

Mysore [Excluding Heggadadevankote Taluk]

B

7

Dharwad

   

8

Bellary [Excluding Kudligi, Hadagalli, Sandur & Hagarihalli Taluks]

   

9

Davangere [Excluding Harapanahalli Taluk]

   

10

Mandya

   

11

Kanakapura & Magadi of Bangalore Rural District

   

12

Bijapur

   

13

Bidar [Excluding Aurad, Basavakalyan, Bhalki & Humnabad Taluks]

   

14

Raichur [Excluding Devadurga, Manvi & Lingsugur Taluks]

   

15

Chickmagalur

   

16

Kodagu

   

17

Kolar [Excluding Bagepalli & Srinivasapur Taluks]

   

18

Chitradurga [Excluding Molakalmuru, Hollalkere & Hosdurga Taluks]

   

19

Hassan

   

20

Gulbarga [Exclg. Jevargi, Chincholi, Aland, Yadgir, Afzalpur, Shorapur & Shahpur Tqs.]

   

21

Uttara Kannada [Excluding Mundagod & Joida {Supa} Taluks]

   

22

Chamarajanagar

C

23

Gadag [Excluding Ron, Shirahatti, Naragund & Mundargi Taluk]

   

24

Udupi

   

25

Haveri [Excluding Shiggaon & Byadgi Taluk]

   

26

Bagalkot [Excluding Bilgi Taluk]

   

27

Koppal [Excluding Kushtagi & Yelbarga Taluks]

   

28

Kudligi, Hadagalli, Sandur & Hagarihalli of Bellary District

   

29

Ramdurg of Belgaum District

   

30

Harapanahalli of Davangere District

   

31

Pavagada, Sira & Gubbi of Tumkur District

   

32

Heggadadevankote of Mysore District

   

33

Growth Centres at Raichur, Dharwad & Hassan

   

34

Mini Growth Centres at Bijapur, Bellary, Malur, Nippani, Gadag, Chikkabalapur & Chitradurga.

   

35

Agro Parks, Apparel Parks, Special Economic Zone, Export Promotion Industrial Parks at Mangalore, Auto Parks, Chemical Industrial Parks and Jewelry Parks [excluding those set up in Zone A]

   

36

Aurad, Basavakalyan, Bhalki & Humnabad of Bidar District

   

37

Jevargi, Chincholi, Aland, Yadgir, Afzalpur, Shorapur & Shahpur of Gulbarga Dist.

D

38

Kundgol of Dharwad District

39

Devadurga, Manvi & Lingsugur of Raichur District

40

Kushtagi & Yelbarga of Koppal District

41

Bilgi of Bagalkot District

42

Mundargi, Ron, Naragund & Shirahatti of Gadag District

43

Shiggaon & Byadgi of Haveri District

44

Molakalmuru, Hollalkere & Hosdurga of Chitradurga District

45

Bagepalli and Srinivaspur of Kolar District

46

Mundagod & Joida [Supa] of Uttar Kannada District


Annexure - 2


List of key projects in core areas


  1. Electronics
  2. Electronics
  3. Telecommunication
  4. Informatics
  5. Precision Tooling/ Tool Room Industries including units manufacturing dies, jigs and fixtures
  6. Ready-made Garments including Leather Garments [excluding leather tanning units]
  7. Units manufacturing equipment for pollution control, effluent treatment plant and water recycling
  8. Bio-technology industries.
  9. Bio-Informatics
  10. Agro Food Processing industries
  11. Equipment for utilization of renewable/non-conventional source of energy and energy conservation
  12. 100% Export Oriented Industries
  13. Spinning Mills, Weaving units, Powerloom, Knitting & Textile Processing
  14. Cutting, polishing and processing of semiprecious stones
  15. Pharmaceuticals industry including bulk drug and formulations
  16. Floriculture
  17. Industries manufacturing equipment for water conservation i.e. drip irrigation, etc.
  18. Automobile industries for manufacture of Two wheelers/ passenger cars, LCVs/HCVs
  19. Machine Tools/ Auto Components
  20. Jewelry
  21. Cold Storages
  22. Cement and Steel/Steel Alloys
  23. Sugar industry
  24. Grey Iron and other Foundries

Annexure - 3


List of Industries not eligible for Incentives and Concessions


  1. Pop-Corn & Ice Candy making units.
  2. Coffee Roasting & Grinding
  3. Khandasari units
  4. Breweries & Distilleries of all types
  5. Photo Studios & Colour Processing Centres
  6. Photo Copying & Xerox Machines
  7. Power Laundries
  8. Clock & Watch Repair Shops
  9. Cassette Recording [Audio & Video]
  10. Fertilizer Mixing
  11. Units using molasses/ rectified spirit/ denatured spirit as main raw material for manufacturing of potable alcohol
  12. Repacking of drugs/ medicines/ chemicals, etc. without any processing and value addition, excluding formulation units.
  13. All types of Saw Mills.
  14. Beedies
  15. Cigarettes
  16. Cigars
  17. Gutka
  18. Tobacco Based Industries
  19. Azoic Dyes
  20. Fire Crackers
  21. Reactive Dyes
  22. Cyanide
  23. Industries Manufacturing and/or utilizing Ozone depleting substances